ज़ेयाद मसरूर खान की किताब ‘सिटी ऑन फायर–अ बॉयहुड इन अलीगढ़’ उनके अलीगढ़ के पुराने इलाके, ऊपर कोट, में पलने-बढ़ने की कहानी है। उत्तर प्रदेश के शहर अलीगढ़ के इस कोने में, हिन्दू और मुसलमान एक दुसरे के अगल-बगल पुराने समय से रह रहे हैं। और शायद, हमको ये सुनके बहुत आश्चर्य नहीं होगा कि हिन्दू-मुस्लिम दंगे भी यहाँ समय-समय पर होते रहे हैं। इसी सांप्रदायिक तनाव — जो जब-तब जानलेवा हिंसा का रूप ले लेता था — के बीच में बीते बचपन, किशोरावस्था, और जवानी के पहले-पहले सालों का ज्वलंत और जीवंत विवरण है ‘सिटी ऑन फायर’। एक्स (ट्विटर) और इंस्टाग्राम पर ज़ेयाद खान अमेज़न...
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View allअपनी माँ के देहांत के बाद, कुनाल पहाड़ों में स्थित बोर्डिंग स्कूल में पढ़ने आता है, और वहाँ पहले कुछ महीने अपनी ‘आंटी’ तारा के साथ ठहरता है। तारा उसी स्कूल में म्यूज़िक टीचर है और वो खुद अभी तक अपनी प्रिय सखी, नीसा, के मौत से उबरी नहीं है। अपने प्रियजनों की मृत्यु से शोकागुल दो लोगों की कहानी है, लेखक नंदिता बासु की कृति, ‘स्टार्री स्टार्री नाईट’, यानि ‘तारों से जगमगाती रात’। ये उपन्यास एक ‘ग्राफ़िक नॉवेल’ है, अर्थात चित्र-कथा या कॉमिक-बुक शैली में लिखी गई है। टीवी और वीडियो गेम्स या ऑनलाइन गेमिंग के ज़माने से पहले बच्चे कॉमिक्स पढ़ते थे। फिर...
अगर कहीं उर्दू भाषा का ज़िक्र हो जाय, तो लोग उसकी तारीफ़ तो करते हैं, मगर अक्सर लगता है कि ये उर्दू-प्रेम महज शब्दों तक सीमित है। डॉक्टर रक्षंदा जलील अपनी किताब ‘उर्दू – द बेस्ट स्टोरीज़ ऑफ़ आवर टाइम्स’ के शुरुआती पन्नों में हिंदुस्तान में उर्दू के हाल पर सवाल तो उठाती हैं, मगर साथ-साथ हमको आश्स्वत भी करती हैं कि यहाँ उर्दू आज भी एक जीती-जागती, फलती-फूलती भाषा है। सादत हसन मंटो, इस्मत चुगताई, प्रेमचंद, और राजिंदर बेदी जैसे दिग्गज उर्दू लघु-कथा के लेखकों की दुनिया से आगे ले चलती, इस किताब में प्रस्तुत लघु-कहानियाँ मुख्यतः १९९० के बाद छपी हैं। इन कहानियों को चुना, और उनका अंग्रेज़ी...
जब १९८० के दशक में सम्राट चौधरी मेघालय की राजधानी शिलांग में पल-बढ़ रहे थे तो वहाँ के विधान-सभा भवन के दीवार पर किसी ने बड़े अक्षरों में लिख दिया था ‘खासी बाय ब्लड, इंडियन बाय एक्सीडेंट‘। मतलब — ‘मेरी पहचान, मेरा नस्ल, खासी है; हिंदुस्तानी तो महज इत्तेफ़ाक़ से हूँ।’ जब उनके दोस्त नागालैंड या मणिपुर से कलकत्ता, दिल्ली, या मुंबई आ रहे होते थे तो वे कहते थे, ‘हम इंडिया जा रहे हैं।’ पूर्वोत्तर भारत के उन्नीसवीं और बीसवीं शताब्दी के राजनितिक इतिहास को हम दो भागों में बाँट सकते हैं। पहला भाग — अंग्रेज़ी हुकूमत द्वारा इस क्षेत्र को भारत से जोड़ने का...
अगर आप की माँ आपसे कहती हों, बेटा, “मेक अ लिविंग,” मतलब अच्छा खाओ-कमाओ और इज़्ज़त-हैसियत के साथ जियो। और, उसके विपरीत, आपके पिता जी आपसे कहते हों, बेटा, “मेक अ लाइफ,” मतलब सार्थक ज़िन्दगी जियो, पैसे और शोहरत के पीछे मत भागो। तो आप क्या करेंगे? अगर आप गुरचरन दास हैं तो आप दोनों चीज़ करते हैं। व्यस्क ज़िन्दगी के पहले तीन दशकों में मल्टीनेशनल कंपनियों में काम करके एक बेहद सफल करियर बनाते हैं। फिर ५२ साल की उम्र से एक लोकप्रिय लेखक और बुद्धजीवी के रूप में जाने जाते हैं। आइये सुनते हैं, गुरचरन दास के साथ उनके रोचक संस्मरण, अनदर सॉर्ट ऑफ़ फ्रीडम यानी एक अलग किस्म की आज़ादी पर एक चर्चा। ट्विटर पर...
दिल्ली से पूरब की ओर की ट्रेन या बस पकड़ने पर कानपूर-लखनऊ के आस-पास पहुँचने पर एक बॉर्डर आता है, जो मैप पर नहीं दिखता है — ‘मैं’ और ‘हम’ का बॉर्डर। इस सीमा को पार करने के बाद लोग ‘मैं’ की जगह ‘हम’ का प्रयोग करने लगते हैं और आप जान जाते हैं कि अब आप उत्तर प्रदेश के पश्चिमी भाग को छोड़ कर राज्य के पूर्वी भाग में आ गए हैं। लखनऊ, कानपूर, बनारस और ईलाहबाद के अलावा ये क्षेत्र गोरखपुर जैसे अन्य छोटे शहरों का भी है। अपनी कहानियों की किताब ‘टाल टेल्स बाय अ स्माल डॉग’ में ओमैर अहमद गोरखपुर की संकरी गलियों और बीते हुए वक़्त में टहलते...
ईस्ट इंडिया कंपनी ने ११ सितम्बर सन १८०३ को पटपड़गंज की लड़ाई में मराठा ताकतों को हरा कर दिल्ली और उसके आसपास के छेत्रों पर कब्ज़ा पा लिया और इसके साथ ही दिल्ली के इतिहास में अंग्रेज़ी हुकूमत का दौर आरम्भ हुआ। एक तरफ लाल किले पर तख्तनशीन मुग़ल बादशाह शाह आलम, अकबर और बहादुर शाह ज़फर, और एक तरफ डेविड ऑक्टरलोनी, चार्ल्स मेटकाफ, और विलियम फ़्रेज़र जैसे अंग्रेज़ी रेज़िडेंट हुक्मरान। एक तरफ मिर्ज़ा ग़ालिब, मोमिन, और ज़ौक़, तो एक तरफ देल्ही कॉलेज से जुड़े गणितज्ञ मास्टर राम चन्दर, और विद्वान सर सय्यद अहमद खान। नए स्कूल और कॉलेज, ज्ञान-विज्ञान, प्रिंटिंग प्रेस, टेलीग्राफ, और अख़बार की दिल्ली में...
जॉन लेनन, पॉल मक्कार्टनी, जॉर्ज हैरिसन, रिंगो स्टार – क्या आज से ५०० साल बाद, एक आम इंसान रॉक म्यूजिक के बैंड ‘द बीटल्स’ के सदस्यों का नाम से वाकिफ होगा? शायद ये सवाल इतना अटपटा भी नहीं है। ये तो हक़िकत है कि आज एक सत्रह साल का युवक बीटल्स के गानों को सुन के ठीक उसी तरह झूमता है, जिस तरह ६० साल पहले उसके दादा-दादी इन्हीं गानों को सुन के झूमा करते थे। महज २५ साल के उम्र में इंग्लैंड के लिवरपूल शहर के ये चार लड़के शायद इतनी शोहरत और धन-दौलत को संभाल नहीं पा रहे थे और चैन व तठस्थता की खोज ने उनको हिन्दू धर्म और अध्यात्म की ओर खींचा। वे महर्षि महेश योगी के निमंत्रण पर उनके ऋषिकेश...
साल १९९९, अप्रैल महीने का आखिरी दिन — दिल्ली में, क़ुतुब मीनार से सटे हुए, टामारिंड कोर्ट नाम के रेस्त्रां में एक पेज-३ पार्टी चल रही थी। पार्टी में, जेसिका लाल जो कभी फैशन-मॉडल हुआ करती थीं, ‘सेलिब्रिटी बारटेंडर’ बनी हुई थीं। रात के दो बजे, जब जेसिका ने एक नेता जी के लड़के को ड्रिंक्स देने से इंकार कर दिया तो उसने गोली चला कर जेसिका को वहीं मार डाला। इस सनसनीखेज हत्याकाण्ड को कल्पित रूप देते हुए, पत्रकार कनिका गहलौत ने अपने अंग्रेज़ी उपन्यास ‘अमंग द चैटराटी’ की शुरुआत की है। २००२ में प्रकाशित, दिल्ली की सेलिब्रिटी, फैशन, राजनीती, और पत्रकारिता की दुनिया से जुड़ी...
एडवरटाइजिंग के क्षेत्र में अफ़सर, चित्रकार, फिल्म निर्माता, फैशन डिज़ाइनर, सूफी-संगीत समारोह के आर्गेनाइजर, सूफी भक्त, शेरोशायरी के आशिक़, अवध के तालुकदार खानदान के वारिस – मुज़फ्फर अली ये सब कुछ हैं। अगर इन्होंने अपनी ज़िन्दगी के लम्बे सफर में बहुत कुछ देखा है, तो वो इसलिए क्योंकि इन्होंने बहुत कुछ किया, और इसलिए भी क्योंकि इन्होंने बहुत कुछ करने की कोशिश की। ये बात समझ में आती है इनके आत्मकथा, ‘ज़िक्र – इन द लाइट एंड शेड ऑफ़ टाइम’ को पढ़ के। सुनिए, मुज़फ्फर अली के साथ उनकी आत्मकथा पर एक चर्चा। इंस्टा पर मुज़फ्फर अली मुज़फ्फर अली द्वारा लिखी गईं पुस्तकें — नॉन फिक्शन...