नीरा चंढोक अपनी बेटी के साथ जब इस्तांबुल में वहाँ के भव्य मस्जिदों को देख रहीं थीं, तब उनकी बेटी ने उनका ध्यान मस्जिद के दीवारों में बने आकारों की ओर खींचा, और उनको याद दिलाया कि ठीक वैसे ही आकर या डिज़ाइन हिंदुस्तान के पारम्परिक कपड़ों में भी देखने को मिलते हैं। हम सब जुड़े हुए हैं और हमारी विरासत मिली-जुली है। अपनी किताब, ‘लैंग्वेजेज़ ऑफ़ फ्रीडम’ यानी ‘आज़ादी की भाषाएँ’ में भारत-वासियों की इस सांझी-विरासत पर डॉ चंढोक ने ज़ोर दिया है और ये दिखाने की कोशिश की है कि अगर हमको अपनी आज़ादी − सोचने की, अभिव्यक्ति की, अपने मन-अनुसार जीने की − प्रिय है तो इस विरासत को संजोय रखना बहुत ज़रूरी है।
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(‘सम्बन्ध का के की’ के टाइटिल म्यूज़िक की उपलब्धि, पिक्साबे के सौजन्य से।)



